OBC Creamy Layer Rule: सिर्फ माता-पिता की सैलरी से OBC क्रीमी लेयर तय नहीं हो सकता, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया।

OBC Creamy Layer Rule: क्रीमी लेयर (Creamy Layer) वह श्रेणी है, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आर्थिक और सामाजिक रूप से अधिक सक्षम परिवारों को रखा जाता है ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सके। सरकार आए, पदों और सामाजिक स्थिति जैसे मानकों के आधार पर क्रीमिलेयर तय करती है। जो परिवार तय सीमा के ऊपर आते हैं, उन्हें OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। इस व्यवस्था का उद्देश्य समान अवसर सुनिश्चित करना और कमजोर वर्गों को शिक्षा व रोजगार में आगे बढ़ने का मौका देना है।

Supreme Court of India ruling that OBC creamy layer cannot be determined only by parents' salary
OBC आरक्षण से जुड़े क्रीमी लेयर नियम पर Supreme Court of India ने स्पष्ट किया कि केवल parents income के आधार पर फैसला नहीं होगा।

 

OBC Creamy Layer Rule: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के तहत, क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्धारण में माता पिता के पद और उनके सामाजिक प्रशासनिक दर्जे को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए उन कई यूपीएससी अभ्यर्थियों को राहत दी, जिन्हें सिविल सेवा परीक्षा पास करने के बावजूद नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था क्योंकि उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया गया था।

अदालत ने कहा कि केवल आय के आधार पर क्रीमिलियर तय करना कानून के अनुरूप नहीं है। न्यायमूर्ति महादेवन ने अपने फैसले में कहा, किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर या नॉन क्रीमी-लेयर ” में रखना केवल आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।

OBC Creamy Layer Rule, क्या था मामला?

यह विवाद उन अभ्यर्थियों से जुड़ा था जिन्होंने OBC नॉन क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया था। सत्यापन के दौरान कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने उनके माता पिता की वेतन आय को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी-लेयर में शामिल कर दिया। इनमें से कई अभ्यर्थियों के माता पिता, पीएसयू बैंकों या अन्य संस्थानों में कर्मचारी थे।

सरकार ने 14 अक्टूबर 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का हवाला देते हुए कहा था कि यदि किसी पद की सरकारी पदों से समानता तय नहीं हुई है तो आय के आधार पर क्रीमी लेयर का निर्धारण किया जा सकता है।  इस आधार पर जिन अभ्यर्थियों के माता- पिता की आय तय सीमा से अधिक थी, उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया गया था।

क्रीमी लेयर के लिए 1993 के आदेश की क्या व्यवस्था थी। (OBC Creamy Layer Rule)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1993 का कार्यालय ज्ञापन (OM), जो इंदिरा साहनी फैसले के बाद जारी हुआ था, स्पष्ट रूप से बताता है कि क्रीमीलेयर का निर्धारण मुख्य रूप से माता पिता के पद और सामाजिक स्थिति के आधार पर होगा।

इस आदेश में यह भी कहा गया था कि वेतन और कृषि आय को आय/ संपत्ति परीक्षण में शामिल नहीं किया जाएगा। आय का परीक्षण केवल उन मामलों में लागू होगा जहां पद के आधार पर सामाजिक स्थिति तय नहीं की जा सकती।

2004 के स्पष्टीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी। (OBC Creamy Layer Rule)

अदालत ने कहा कि 2004 का स्पष्टीकरण इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि वह 1993 की नीति को कमजोर या निष्प्रभावी कर दे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता- पिता की वेतन आय को जोड़कर क्रीमी लेयर तय करना गलत है और इससे संविधान में निहित आरक्षण की मूल भावना प्रभावित होती है।

अदालत ने यह भी कहा कि एक स्पष्टीकरण पत्र मूल नीति में नया नियम नहीं जोड़ सकता।

समानता के अधिकार का उल्लंघन। (OBC Creamy Layer Rule)

कोर्ट ने यह भी पाया कि सरकार की व्याख्या से सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू/ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच असमानता पैदा हो रही थी।

उदाहरण के लिए, यदि किसी ग्रुप सी या ग्रुप डी के सरकारी कर्मचारी की आय बढ़ जाती है, तो उसके बच्चे को स्वतः क्रीमिलियर नहीं माना जाता, लेकिन पीएसयू या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों को केवल आय अधिक होने के कारण क्रीमिलेयर माना जा रहा था।

अदालत ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छे 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

क्रीमिलियर के मामले में क्या है अदालत का आदेश।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्टों के फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की अपीलें खारिज कर दी और निर्देश दिया कि संबंधित अभ्यर्थियों के मामलों पर इस फैसले के सिद्धांतों के अनुसार दोबारा विचार किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आवश्यक हो, तो प्रभावित अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त पद बनाए जाएं और यह प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जाए।

निष्कर्ष

OBC क्रीमिलेयर को तय करने को लेकर दिया गया यह फैसला सामाजिक न्याय और समान अवसर की दिशा में अहम माना जा रहा है।इससे साफ संकेत मिलता है कि केवल माता पिता की सैलरी के आधार पर किसी की सामाजिक आर्थिक स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।भविष्य में इससे पात्र लोगों को आरक्षण का सही लाभ मिलने और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।यह निर्णय नीति निर्माण और लाभार्थियों की पहचान के तरीके पर भी सकारात्मक असर डाल सकता है।

Disclaimer : यह जानकारी सामान्य समझ और सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार की गई है, क्रीमी लेयर से जुड़े नियम, आय सीमा और पात्रता मानदंड समय- समय पर सरकार द्वारा बदले जा सकते हैं। किसी भी आवेदन या आधिकारिक प्रक्रिया से पहले संबंधित विभाग की वेबसाइट या अधिसूचना से जानकारी की पुष्टि अवश्य करें। किसी भी निर्णय के लिए लेखक जिम्मेदार नहीं होगा।

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